भारत जैसे देश में जातिगत भेदभाव एक स्याह सच्चाई है, जिसे तथाकथित ऊँची कही जाने वाली जातियाँ इसे सामान्य मानते हुए स्वीकार्यता भी देती है और इसका पालन भी करती हैं। जहाँ जातिगत भेदभाव सबसे निर्मम रूप में मौजूद हो वहाँ 'अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम जैसे सुरक्षात्मक कानूनों की प्रासंगिकता निर्विवाद रूप से बहुत अधिक है। ताकि अस्पृश्यता एवं जातिगत विद्वेष जैसी अमानवीय व्यवस्था के विरुद्ध भय उत्पन्न हो सके और समाज में ऐसी अमानवीय अपराध न हो।
परन्तु एससी-एसटी एक्ट में हुए बदलाव के बाद न केवल यह भय ख़त्म हो गया है बल्कि एक तरह से अपराध करने के लिए प्रोत्साहन भी मिल गया है। किसी वारदात के हो जाने पर गिरफ्तारी से पहले जाँच एवं अग्रिम जमानत जैसी व्यवस्था ने एससी-एसटी एक्ट को सामान्य प्रक्रिया से भी बहुत कमज़ोर बना दिया है जिससे इस अधिनियम के होने के मायने ही ख़त्म हो गए हैं। ऐसे में यदि आरोपी, जाँच अधिकारी या पुलिस महकमें के मुखिया का जात भाई यानि सजातीय तथा परिचित हो तो जाँच और सबूतों को किसी भी हद तक पीड़ित के विरूद्ध प्रभावित कर सकता है। ऐसे में एक्ट में यह बदलाव इस कानून के दुरूपयोग के नए दरवाज़े खोलता है जो सीधे उच्च जातियों को ही फ़ायदा पहुँचायेंगे। इस बात की पूरी संभावना है कि यदि आरोपी व्यक्ति को अग्रिम ज़मानत दे दी जाती है तो वह पीड़ित को केस वापस लेने के लिए दबाव बनाने और सबूतों से छेड़छाड़ करने का काम कर सकता है।
किसी भी कानून का मुख्य उद्देश्य समाज को व्यवस्था,स्थायित्व और न्याय देना होता है। किसी अपराध का सिद्ध न हो पाना उसके घटित न होने की अंतिम व्याख्या नहीं होती। ऐसे कई अपराध होतें हैं जो घटित होने के बाद भी साबित नहीं हो पाते। अपराध के सिद्ध होने में कई पहलू शामिल होते हैं जैसे पीड़ित की मानसिक-शारीरिक-आर्थिक-सामाजिक स्थिति, पुलिस की सबूत जुटाने की तत्परता,अच्छा वक़ील, राज्य एजेन्सियों का सहयोग, परिवार और दोस्तों का रवैया आदि। परंतु अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति के विरुद्ध होने वाले अपराध के मामलों में ये सारी परिस्थितियां प्रतिकूल होती हैं। क्योंकि आज भी वे समाज में हाशिये पर स्थित हैं, जिनकी स्थिति जातिगत भेदभाव के कारण बेहद दयनीय है। इन वर्गों की भागीदारी संसद,कार्यपालिका, न्यायपालिका, प्रशासन, पुलिस, उद्योग, मीडिया में लगभग न के बराबर है। कमज़ोर आर्थिक और सामाजिक स्थिति होने के चलते इन पर दोहरी मार पड़ती है। इन सब स्थितियों के चलते अपराध साबित करने की परिस्थिति अत्यंत प्रतिकूल होती है। इन प्रतिकूल स्थितियों के कारण दोषसिद्धि न होने पर कानून के दुरूपयोग का टैग मिल जाता है। इसलिए दोषसिद्धि को अंतिम पैमाना माना जाना उचित नहीं है।
एससी-एसटी एक्ट के दुरूपयोग का मामला भी कुछ चयनित स्त्रोतों के आधार पर कर लिया गया। यह तर्क भी नाकाफ़ी है कि दुरूपयोग के कुछ मामले एक्ट को बदलने की वैधानिकता प्रदान करते हैं। कुछ अपवाद कानून बदलने का आधार नहीं देते। यदि देते हैं तो फिर कितने कानून बदले जाएंगे? दहेज़ से लेकर यौन उत्पीड़न तक के मामलों में दुरूपयोग सामने आए हैं तो क्या इन कानूनों को ख़त्म या निष्प्रभावी कर दिया जाए? क्या नई परिवर्तन से किसी भी प्रकार का दुरुपयोग पीड़ित या आरोपी के संदर्भ में नहीं होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ कुछ तथ्यों पर विचार किया जो पहली नज़र में इस कानून के दुरुपयोग की डरावनी कहानी कहते थे जबकि उन तथ्यों की सिरे से अनदेखी की गई जो जातिगत दमन और घृणा दिखाते थे। एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2007 से 2017 के बीच दलितों के विरुद्ध हिंसा में 86% की वृद्धि हुई, हर 15 मिनिट में एक दलित के विरुद्ध अपराध किया जा रहा है। साथ ही हर दिन 7 दलित औरतों-लड़कियों के साथ बलात्कार की वारदात घट रही है। हज़ारों मामले हैं जो बहिष्कार, हत्या, बलात्कार, लूट, घर जला देने, अपंग कर देने आदि के भय में रिपोर्ट ही नहीं किये जाते। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट को भी अपेक्स कोर्ट ने अनदेखा कर दिया। क्या यह डरावने हालात इन वर्गों के संरक्षण का सवाल नहीं रखते?
कानून बनाना संसद का दायित्व है, इसलिए इस कानून में बदलाव संसद की सामूहिक चेतना पर भी सवालिया निशान लगाता है जब उसने एससी-एसटी एक्ट को जानबूझकर कठोर बनाया ताकि जातीय घृणा रोकी जा सके। इस रूप में कानून बनाने के संसद के क्षेत्राधिकार में न्याय व्यवस्था द्वारा अनावश्यक हस्तक्षेप किया गया है। क्योंकि जहाँ विधायन स्पष्ट हों वहाँ न्यायपालिका को दिशानिर्देश देने की आवश्यकता या उसमें परिवर्तन करने की आवश्यकता नहीं है। फ़िर "बलोथिया वाद' में सुप्रीम कोर्ट ने यह माना था कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम 1989 की धारा-18 भारतीय संविधान के अनुच्छेद-14 और 21 उल्लंघन नहीं करती क्योंकि सीआरपीसी की धारा-438 का निषेध विशिष्ट सामाजिक स्थितियों को देखते हुए किया गया था। भारतीय सामाजिक संदर्भों और संरचना पर विचार किये बिना परिवर्तन का निर्णय एक ख़ास वर्ग को समर्थन देता है।
साथ ही, इस कानून को भातृत्व के अनुकूल बनाने की बात कहकर सुप्रीम कोर्ट जिस वर्ग यानि एससी और एसटी समुदायों से भातृत्व बनाए रखने का आग्रह करती है वो आग्रह भी भारतीय समाज को देखते हुए विरोधाभासी है। ऐसा आग्रह एक तरह से पीड़ितों से ही अपेक्षा है कि वे समाज में समरसता और भाईचारा बनाए रखें। जबकि पीड़ित वर्ग या तो अपनी पीड़ा में चीख़ रहा है या सुन्न हो गया है। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय और आग्रह पीड़ितों को कानून से ख़ारिज करने के साथ-साथ न्याय की अंतिम किरण को भी ख़त्म करता है।

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